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Hum Chini Nahi Bhartiya Hain– पूर्वोत्तर भारत की पहचान और दर्द

देहरादून में मणिपुर के एक 24 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा की हत्या की खबर ने उत्तराखण्ड के साथ ही पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एंजेल चकमा को केवल उसकी शारीरिक बनावट और पूर्वाेत्तर से होने की पहचान के कारण “चीनी” कहकर निशाना बनाया गया। एंजेल चकमा देहरादून में पढ़ाई के लिए रह रहा था। वह अपने भविष्य को लेकर सपने देख रहा था, अपने परिवार की उम्मीदों को कंधों पर उठाए एक सामान्य भारतीय युवा की तरह जीवन जी रहा था।

लेकिन उसकी शक्ल, उसकी आँखें, उसका पहनावा कुछ लोगों को यह तय करने के लिए काफ़ी था कि वह “अपना” नहीं है। नफ़रत के बीच एंजेल चकमा के आखरी शब्द थे-“Hum Chini Nahi Bhartiya Hain” यह वाक्य केवल एक व्यक्ति की अंतिम पुकार नहीं, बल्कि पूरे पूर्वाेत्तर भारत के दर्द और अपमान का प्रतीक बन गया है।

Nido Taniam का मामला और राष्ट्रीय बहस

भारतीय सामाजिक इतिहास में एक और अत्यंत दुख ददुर्घटना दर्ज है-नीडो तानियाम (Nido Tania) की मृत्यु। नीडो तानियाम अरुणाचल प्रदेश के एक 19 वर्षीय छात्र थे और वहां के एक तत्कालीन विधायक के बेटे थे। वे दिल्ली के लाजपतनगर में अपने दोस्तों के साथ थे, जब एक दुकान पर उनके बालों के रंग और उनके लुक को लेकर कुछ दुकानदारों ने नस्लीय टिप्पणी की।

जब नीडो ने इस अपमान का विरोध किया और दुकान का शीशा टूटा, तो भीड़ ने उन पर बेरहमी से हमला किया। अगले दिन (30 जनवरी) उनकी मृत्यु हो गई। पूर्वाेत्तर भारत के लोगों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव (Racial Discrimination) के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े विमर्श में बदल दिया।

पूर्वाेत्तर भारत के लोग दशकों से इस तरह के भेदभाव का सामना करते आ रहे हैं। उन्हें बार-बार “चीनी”, “नेपाली” या “विदेशी” कहकर अपमानित किया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि वे उतने ही भारतीय हैं जितना देश का कोई भी नागरिक।

यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना का भी है। सवाल यह नहीं है कि अपराधियों को सज़ा मिलेगी या नहीं-हालाँकि सज़ा मिलनी ही चाहिए-सवाल यह है कि किसी समाज में यह सोच क्यों पनप रही है कि वह एक ऐसे समाज में पहुँच गए हैं जहाँ की बनावट किसी की राष्ट्रीयता तय करने लगती है?

एंजेल चकमा की हत्या के बाद उठ रहा आक्रोश यह दिखाता है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी इंसानियत के साथ खड़ा है। लोग यह मांग कर रहे हैं कि इस मामले की निष्पक्ष और सख्त जांच हो, दोषियों को कड़ी सजा मिले और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ। साथ ही यह भी ज़रूरी है कि शिक्षा, मीडिया और सार्वजनिक विमर्श के ज़रिये पूर्वाेत्तर भारत को लेकर फैली अज्ञानता और रूढ़ धारणाओं को तोड़ा जाए।

Hum Chini Nahi Bhartiya Hain– पूर्वोत्तर भारत की पहचान और दर्द

एंजेल चकमा अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसका आखरी वाक्य-“Hum Chini Nahi Bhartiya Hain”-एक सवाल बन कर हमारे सामने खड़ा है। एक ऐसा सवाल, इसका जवाब समाज को अपने भीतर झाँक कर देना होगा

Hum Chini Nahi Bhartiya Hain”-पूर्वाेत्तर भारत की अस्मिता और राष्ट्रीय एकता का स्वर

पूर्वाेत्तर भारत, जिसे अक्सर ‘‘सात बहनों’’ (Seven Sisters) के रूप में जाना जाता है, भारत का वह भौगोलिक और सांस्कृतिक सिरा है जो अपनी विशिष्टता के लिए जितना प्रसिद्ध है, उतना ही अपनी चुनौतियों के लिए भी। भारत का यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से भले ही देश के सुदूर कोने में स्थित हो, परंतु ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक दृष्टि से यह भारत की आत्मा का अभिन्न अंग है।

‘‘Hum Chini Nahi Bhartiya Hain’’ यह वाक्य केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरा दर्द, एक सशक्त पहचान और एक राष्ट्रीय दावा है। यह उन करोड़ों भारतीयों की आवाज है जो नस्लीय भेदभाव (Racial Discrimination), भौगोलिक अलगाव और ऐतिहासिक उपेक्षा के बावजूद खुद को तिरंगे के नीचे गर्व से खड़ा पाते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि पूर्वाेत्तर भारत का इतिहास भारतीय मुख्य धारा के इतिहास से अलग नहीं है, बल्कि उसका एक अभिन्न अंग है। यह क्षेत्र प्राचीनकाल से भारतीय सभ्यता का हिस्सा रहा है। कामरूप, प्राग्ज्योतिषपुर, मणिपुरराज्य, अहोमसाम्राज्य-ये सभी भारतीय इतिहास के गौरवशाली अध्याय हैं।

महाभारत में मणिपुर का उल्लेख मिलता है, जहाँ अर्जुन ने चित्रांगदा से विवाह किया। कामाख्या शक्तिपीठ भारतीय तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र रहा है। अहोम साम्राज्य, जिसने मुगलों को कभी पैर नहीं जमाने दिए, से लेकर रानी गाइदिनल्यू और यू तिरोत सिंग जैसे स्वतंत्रता सेनानियों तक, इस क्षेत्र का योगदान स्वर्णिम रहा है।

हालांकि, ब्रिटिश काल के दौरान ‘‘इनर लाइन परमिट’’ (ILP) जैसी नीतियों ने इस क्षेत्र को बाकी भारत से थोड़ा अलग-थलग कर दिया। आजादी के समय विभाजन ने इस अलगाव को और गहरा किया, जब ‘‘चिकन नेक’’ (सिक्किम और पश्चिम बंगाल के बीच का गलियारा) के माध्यम से यह क्षेत्र शेष भारत से केवल एक संकीर्ण पट्टी से जुड़ा, परन्तु भौगोलिक दूरी ने कभी भी भावनात्मक दूरी को कम नहीं किया।

‘‘चीनी’’ कहे जाने का दंश

नस्लीय रूढ़िवादिता पूर्वाेत्तर भारत के अधिकांश नागरिक मंगोलॉयड नस्लीय विशेषताओं वाले हैं-छोटी आँखें, सपाट नाक, पीतवर्ण। भारत के अन्य हिस्सों में पूर्वाेत्तर के लोगों को उनके शारीरिक लक्षणों (Mongoloid features) के आधार पर ‘‘चीनी’’ या ‘‘विदेशी’’ समझना एक गंभीर सामाजिक बुराई रही है

दुर्भाग्यवश, भारत जैसे विविधता पूर्ण देश में भी यह भिन्नता उपहास, भेदभाव और संदेह का कारण बन जाती है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे महानगरों में पूर्वाेत्तर के युवाओं को अकसर “चाइनीज”, “नेपाली”, “कोरियन” कहकर पुकारा जाता है। यह स्थिति तब और विडंबना पूर्ण हो जाती है जब एक व्यक्ति जो खुद को पूर्णतः भारतीय मानता है, उसे अपने ही देश में ‘‘भारतीय’’ होने का प्रमाणपत्र देना पड़ता है।

1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, जब चीनी सेना ने नेफा (अब अरुणाचल प्रदेश) में प्रवेश किया, तब वहां के नागरिकों ने जो साहस दिखाया कि ‘‘हम चीनी नहीं, भारतीय हैं’’। चीन ने दावा किया कि ये लोग ‘‘उनके’’ हैं, लेकिन अरुणाचल के लोगों ने स्पष्ट संदेश दिया कि उनकी निष्ठा केवल भारत के प्रति है।

भारतीयता की बहुलता भारतीयता का अर्थ एकरूपता नहीं, बल्कि विविधता में एकता है। भारत कोई एक नस्ल, एक भाषा या एक संस्कृति नहीं है। यहाँ द्रविड़ हैं, आर्य हैं, मंगोलॉयड हैं; यहाँ हिंदी है, तमिल है, खासी है, मिजो है, बोडो है; यहाँ शैव हैं, वैष्णव हैं, ईसाई हैं, बौद्ध हैं।

पूर्वाेत्तर भारत में 200 से अधिक जनजातियां और उतनी ही बोलियां हैं। पूर्वाेत्तर भारत इसी बहुलता का जीवंत उदाहरण है। यहाँ जनजातीय लोकतंत्र, सामुदायिक जीवन, प्रकृति के साथ सह अस्तित्व और सशक्त महिला परंपराएँ देखने को मिलती हैं। मणिपुर की इमाकेइथेल (महिलाओं का बाज़ार) या मेघालय की मातृ सत्तात्मक व्यवस्था भारतीय समाज को नई दृष्टि देती है।

केंद्र की नीतियां और ‘‘लुक ईस्ट’’ से ‘‘एक्ट ईस्ट’’ लंबे समय तक पूर्वाेत्तर को ‘‘अशांत क्षेत्र’’ (Disturbed Area) के रूप में देखा गया। लेकिन पिछले दो दशकों में दृष्टि कोण बदला है। एक्ट ईस्ट पॉलिसी-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ‘‘एक्ट ईस्ट’’ नीति ने पूर्वाेत्तर को भारत का ‘‘प्रवेश द्वार’’ बना दिया है। दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापारिक संबंधों ने इस क्षेत्र के महत्व को कई गुना बढ़ा दियाहै।

मुख्यधारा के मीडिया को पूर्वाेत्तर को केवल उग्रवाद या बाढ़ की खबरों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि वहां की सफलता की कहानियों को भी दिखाना चाहिए। आम जीवन, कला, साहित्य, खेल और उपलब्धियाँ हाशिए पर चली जाती हैं।

उग्रवाद से मुख्य धारा तक का सफर पूर्वाेत्तर के कई राज्यों ने अलगाववाद का दंश झेला है। ‘‘ग्रेटर नगालैंड’’ की मांग हो या उल्फा (ULFA) की गतिविधियां, इन आंदोलनों के पीछे अक्सर उपेक्षा की भावना रही थी। लेकिन आज अधिकांश उग्रवादी समूह शांति समझौतों के माध्यम से मुख्य धारा में लौट रहे हैं।

जब मीराबाई चानू तिरंगे की नीचे टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतती हैं या लवलीना बोरगोहेन रिंग में उतरती हैं, तो पूरा भारत जश्न मनाता है। पूर्वाेत्तर का खून भारतीय रगों में उतनी ही तेजी से दौड़ता है जितना किसी अन्य क्षेत्र का।

उपसंहार

पूर्वाेत्तर भारत की गूंज अब ‘‘परिधि’’ (Periphery) से निकलकर ‘‘केंद्र’’ (Center) तक पहुंच चुकी है। “Hum Chini Nahi Bhartiya Hain”  एक वाक्य नहीं, बल्कि एक प्रश्न है-हमारे समाज, हमारी शिक्षा और हमारी सोच को दर्शाता है। अब समय है कि शेष भारत अपनी आंखों से वह चश्मा हटा दे जो पूर्वाेत्तर को ‘पराया’ देखता है। पूर्वाेत्तर भारत की सात बहनें और एक भाई भारत की मुकुट मणि हैं, और उनकी भारतीयता पर संदेह करना स्वयं भारत की आत्मा पर संदेह करने जैसा है।

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