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सॉरी’ कहना आसान, ‘माफ कर दीजिए’ क्यों मुश्किल?

वर्ष 2026 में संवत्सरी महापर्व मंगलवार, 15 सितंबर को मनाया गया। यह जैन धर्म के पर्युषण पर्व का अंतिम और आठवां दिन होता है। इस दिन जैन समाज में एक वाक्य विशेष रूप से दोहराया जाता है—“मिच्छामि दुक्कड़म्”। जैन समाज के लोग जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए एक-दूसरे से “मिच्छामि दुक्कड़म्” कहकर क्षमा मांगते हैं।

यह दिन आत्ममंथन, व्रत और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए समर्पित है। यह स्वीकार करने का अवसर है कि मनुष्य अपूर्ण है और यही अपूर्णता उसे विनम्र बनाती है। क्षमा का अर्थ केवल दूसरों से माफी मांगना नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकना भी है।

लेकिन सवाल है—संवत्सरी का यह दीया मंदिर की देहरी तक ही सीमित क्यों रहे?

जब हमसे कोई गलती हो जाती है, तो हम अंग्रेजी में बड़ी आसानी से “Sorry” कहकर बात को हल्का कर देते हैं। लेकिन हिंदी में “क्षमाप्रार्थी हूं” या “मुझे माफ कर दीजिए” कहना कई बार हमें अधिक भारी और असहज लगता है।

हाल ही में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के एक शोध में इस बात पर ध्यान दिया गया कि क्या यह केवल भाषा और उसके इस्तेमाल का अंतर है या इसके पीछे हमारे दिमाग और भावनाओं की भी भूमिका होती है।

दरअसल, भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती। शब्द वही होते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपा अपराधबोध, शर्म और रिश्तों का एहसास भाषा बदलने के साथ बदल सकता है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं का वजन तय करने वाला माध्यम भी है।

जिस भाषा में हम बड़े होते हैं, उसके शब्द हमारे बचपन, परिवार, रिश्तों, सामाजिक अनुभवों और नैतिक समझ से गहराई से जुड़े होते हैं। इसलिए पहली भाषा में किसी गलती को स्वीकार करना कई बार सिर्फ एक वाक्य बोलना नहीं रह जाता। उसके साथ अपराधबोध, शर्म, जिम्मेदारी और सामने वाले के साथ रिश्ते का पूरा भाव जुड़ जाता है।

खासकर वह भाषा जिसे हमने बाद में स्कूल, कॉलेज या कामकाज के दौरान सीखा हो, उसके शब्द हमारे शुरुआती जीवन के भावनात्मक अनुभवों से उतने गहरे जुड़े नहीं होते। इसलिए “I am sorry” कई बार “मुझे माफ कर दीजिए” की तुलना में हल्का और कम बोझिल महसूस हो सकता है।

यानी मामला सिर्फ इतना नहीं है कि अंग्रेजी में ‘सॉरी’ आसान है और हिंदी में माफी मुश्किल। असली सवाल यह है कि हमारी मातृभाषा के शब्द हमारे भीतर कितनी गहरी सामाजिक और भावनात्मक प्रतिक्रियाएं पैदा करते हैं।

‘सॉरी’ कहने से हम कभी-कभी अपनी गलती स्वीकार तो करते हैं, लेकिन उससे पैदा हुए भावनात्मक बोझ से थोड़ा दूर भी रह पाते हैं। वहीं अपनी भाषा में “मैंने गलती की, मुझे माफ कर दीजिए” कहना उस गलती को अधिक सीधे हमारे सामने खड़ा कर देता है।

शायद यही वजह है कि कभी-कभी अंग्रेजी का ‘Sorry’ सिर्फ माफी नहीं, बल्कि भावनात्मक दूरी बनाए रखने का एक छोटा-सा रास्ता भी बन जाता है।

और शायद संवत्सरी हमें इसी दूरी को कम करने का अवसर देती है—दूसरों से क्षमा मांगने के साथ-साथ खुद के भीतर झांकने का भी।

मिच्छामि दुक्कड़म्।

सन्दर्भः-

  1. दैनिक जागरण
  2. he influence of guilt and shame on L1 and L2 apology speech acts in academic contexts
  3. The influence of guilt and shame on L1 and L2 apology speech acts in academic contexts

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