Gen Z India: क्या One Exam तय कर सकता है आपका Future?
भारत की Gen Z आज शिक्षा, रोजगार और लोकतंत्र से जुड़े ऐसे दौर में खड़ी है, जहाँ एक परीक्षा, सीमित रोजगार और संस्थागत चुनौतियाँ उसके भविष्य को प्रभावित कर रही हैं।
देश की Gen Z को यह मूल सत्य आत्मसात करना होगा कि जीवन टी-20 क्रिकेट की तात्कालिकता नहीं, बल्कि टेस्ट मैच के धैर्य, निरंतरता और पुनरागमन की संभावना का नाम है। प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी क्षमता सिद्ध करने के लिए दूसरी पारी का अवसर मिलना ही चाहिए। किसी एक परीक्षा को किसी युवा के संपूर्ण भविष्य का भाग्य-विधाता बना देना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक।
यदि वर्ष भर विभिन्न चरणों में परीक्षाओं का अवसर उपलब्ध कराया जाए, तो न केवल विद्यार्थियों पर मानसिक दबाव और असफलता का भय कम होगा, बल्कि परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था की अनेक संरचनात्मक विसंगतियाँ भी स्वतः कमजोर पड़ेंगी। प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं की रोकथाम के लिए कठोर दंडात्मक और तकनीकी उपाय अनिवार्य हैं, किंतु उससे भी अधिक आवश्यक ऐसी परीक्षा प्रणाली का निर्माण है, जिसमें किसी एक परीक्षा की विफलता जीवन की अंतिम पराजय न बन जाए।
जब एक ही परीक्षा किसी विद्यार्थी के भविष्य की नियति निर्धारित नहीं करेगी, तब उससे जुड़ी अनियमितताओं की गंभीरता और उनके दुष्परिणाम भी स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाएंगे। यही एक अधिक न्यायपूर्ण, पारदर्शी और मानवीय शिक्षा व्यवस्था की पहचान होगी।
Gen Z केवल डिग्री नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण और स्थायी रोजगार की आकांक्षा रखती है। रोजगार व्यक्ति के स्वाभिमान, जीवन के उद्देश्य और व्यक्तिगत विकास का आधार है। रोजगार केवल आय का स्रोत नहीं, बल्कि व्यक्ति के स्वाभिमान, जीवन उद्देश्य और निजी विकास का आधार भी है। कार्य व्यक्ति को केवल आय नहीं देता, बल्कि उसके जीवन को उद्देश्य, पहचान और गरिमा प्रदान करता है। इसके बावजूद, कामकाजी आबादी की तुलना में नौकरियों का विस्तार पर्याप्त गति से नहीं हो पाया है। भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ निरंतर औद्योगिकीकरण और विनिर्माण-आधारित विकास के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन में सक्षम हो।
कोई विचारधारा भले कितनी ही भली क्यों न हो, उसे आम जनजीवन को ठप करने की गुंजाइश नहीं मिलनी चाहिए। विरोध का अधिकार जितना मौलिक है, उतना ही महत्त्वपूर्ण प्रत्येक नागरिक का शांतिपूर्ण और निर्बाध जीवन जीने का अधिकार भी है। लोकतांत्रिक समाज को असहमति व्यक्त करने के ऐसे तौर-तरीके अपनाने चाहिए जो कोई अवरोध पैदा न करें। ऐसे प्रतिरोध, जो संवाद का स्थान टकराव से भर दें, अंततः अपने नैतिक बल को स्वयं ही कमजोर कर देते हैं।
दूसरी ओर शासन-प्रशासन की भी यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह संयम, संवेदनशीलता और संवाद को प्राथमिकता देते हुए परिस्थितियों का समाधान करे। जहां हिंसा नितांत निंदनीय है, वहीं राज्य द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग से विरोध-प्रदर्शन का दमन भी उतना ही अनुचित है। आमरण अनशन, लंबे समय तक सड़क अवरोध और उत्तेजक बयानबाज़ी अल्पकालिक दबाव तो बना सकते हैं, किंतु वे प्रायः विवेकपूर्ण संवाद को पीछे धकेलकर समाज को अनावश्यक धु्रवीकरण की ओर ले जाते हैं।
इस आंदोलन से न केवल Gen Z , बल्कि सभी पीढ़ियों के समक्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवतरित होता है। क्या किसी पक्ष के लिए यह जीत के जश्न का अवसर है या सभी के लिए गंभीर आत्मचिंतन का? डिजिटल युग में पली-बढ़ी इस पीढ़ी ने हास्य, व्यंग्य, मीम संस्कृति और रचनात्मक प्रतीकों को जनसंचार का प्रभावी माध्यम बना दिया। इसमें यह विस्मृत न किया जाए कि शांतिपूर्ण असहमति तभी तक स्वीकार्य हो सकती है, जब वह कानून के शासन, संस्थानों के संचालन और दैनिक जीवन की मुश्किलें न बढ़ाए। लोकतंत्र के लिए असहमति अनिवार्य है, अराजकता नहीं।
यह परिवर्तन केवल भाषा का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संप्रेषण की बदलती संस्कृति का संकेत है। स्वाभाविक है कि परंपरागत दृष्टिकोण रखने वाले लोग इस शैली को लेकर असहज हों, किंतु इसकी प्रभावशीलता को नकारा नहीं जा सकता। व्यंग्य तभी तक सार्थक है, जब तक वह मर्यादा का अतिक्रमण न करे।
मनुष्य का अहंकार शब्दों से पोषित होता है। जहाँ उद्देश्य केवल विजय प्राप्त करना हो, वहाँ तर्क संवाद का माध्यम नहीं, अहंकार के अस्त्र बन जाते हैं। शब्दों की अपनी शक्ति है, किंतु उनकी भी एक मर्यादा है। शब्द क्षणभंगुर होते हैं, किंतु आचरण कालातीत होता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सम्मान के बीच संतुलन ही लोकतांत्रिक संवाद की वास्तविक कसौटी है। जेन-जी को भी यह समझना होगा कि निर्भीकता और उद्दंडता, तथा अभिव्यक्ति और अनादर के बीच एक स्पष्ट और आवश्यक रेखा विद्यमान है।
यह संवाद में शिष्टाचार को लेकर पारंपरिक परिपाटी में परिवर्तन का प्रतीक है।
इस संदर्भ में जेन एक्स का परंपरावादी दृष्टिकोण बदलाव से जुड़े इस बेपरवाह रवैये को लेकर कुछ असहज हो सकता है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता की सराहना भी करनी होगी। कहा जाता है कि ‘संशयी बनो, नकारात्मक नहीं। व्यंग्य और हास्य-परिहास के साथ भाषा की मर्यादा को लांघे बिना किया गया संवाद संभवतः कहीं अधिक प्रभावी संदेश दे सकता है। सभ्य समाज में अभद्रता एवं अशिष्टता के लिए कोई स्थान नहीं। ळमर्द को अभिव्यक्ति और अनादर में अंतर समझना होगा।
हाल के वर्षों में ळमर्द ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल डिजिटल पीढ़ी नहीं, बल्कि सामाजिक और लोकतांत्रिक प्रश्नों पर मुखर होकर अपनी बात रखने वाली पीढ़ी भी है। जनदबाव के परिणामस्वरूप शासन और प्रशासन ने अंततः प्रतिक्रिया दी। फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना, कड़े कानूनों के वादे और शिक्षा मंत्री का बहुचर्चित इस्तीफा हुआ।
निस्संदेह ऐसे निर्णयों का अपना प्रतीकात्मक महत्व होता है, लेकिन केवल प्रतीकात्मकता पर्याप्त नहीं है। ध्यान संस्थागत सुधार की ओर स्थानांतरित होना चाहिए। यदि व्यवस्थागत कमियाँ यथावत बनी रहती हैं, तो केवल व्यक्तियों के परिवर्तन से समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। आवश्यकता ऐसी संस्थाओं के निर्माण की है, जो पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता के आधार पर नागरिकों का विश्वास अर्जित कर सकें।
इस आंदोलन से न केवल Gen Z , बल्कि सभी पीढ़ियों के समक्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवतरित होता है। क्या किसी पक्ष के लिए यह जीत के जश्न का अवसर है या सभी के लिए गंभीर आत्मचिंतन का? सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि इस संघर्ष में कौन विजयी हुआ, बल्कि यह है कि लोकतंत्र ने इससे क्या सीखा। शांतिपूर्ण असहमति तभी तक स्वीकार्य हो सकती है, जब वह कानून के शासन, संस्थानों के संचालन और दैनिक जीवन की मुश्किलें न बढ़ाए।
लोकतंत्र के लिए असहमति अनिवार्य है, अराजकता नहीं।
भारत का भविष्य केवल Gen Z के हाथों में नहीं, बल्कि उन नीतियों में भी निहित है जो उसकी शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक भागीदारी को सशक्त बनाएगी हैं। यदि इस पीढ़ी को बेहतर अवसर, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध कराए जाते हैं, तो यही ळमर्द भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को वास्तविक राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित कर सकती है।
